जब चिड़िया चुग गई खेत
रामपुर में धरम पाल नामक एक किसान था, उसका बेटा रमेश जो कि इंजीनियर था वो नोएडा में पदस्थ था। पत्नी बिमला कुछ दिनों पहले ही स्वर्गवासी हुई थी तब से धरम पाल उदास सा रहने लगा था। पूरी जवानी किसानी कर पाई पाई जोड़ बेटियों की शादी की और रमेश को इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला दिलाया, कोचिंग कराई । एक दो साल की तैयारी के बाद उसे नई नई जॉब मिली थी। वहीं एक सुंदर नवयुवती सहकर्मी से रमेश ने शादी भी कर ली थी। पर रमेश इतने से संतुष्ट नहीं था, उसकी महत्त्वाकांक्षा कुछ ज्यादा पाने की थी। उसे जीवन से कुछ और चाहिए था और वह उसकी तैयारी में लगा था। इधर धरम पाल अकेले समय व्यतीत करने लगा, कभी पड़ोसी कुछ बना कर ले आते तो कभी खुद कुछ रूखा सूखा बना लेता। शुरूआती दिनों में रमेश का फोन अक्सर आ जाया करता था किंतु अभी कुछ महीनों से फोन आने की आवृत्ति काफी कम हो गई थी। धरम पाल यदा कदा खुद फोन कर लेता और बातों बातों में अक्सर उससे रामपुर आने को भी कहता। अभी थोड़ा ऑफिस में काम है, ये एक्जाम आने वाला है आदि कह कर अगले महीने आने का आश्वासन देता था। अगले महीने वो जीवन की आपाधापी में व्यस्त रहते हुए अपना किया वायदा भूल जाता था। एक बार धरम पाल ने रमेश को बोला कि एक बार आकर खेत वगैरह बाग बगीचे ही घूम जाओ, क्या पता कल हम रहे ना रहें। ऐसा न कहो पापा, मैं अगले हफ्ते पक्का आऊंगा। इन सब बातों के बीच रमेश ने कभी धरम पाल के स्वास्थ्य व खान पान का नहीं पूछा, सोचा सब अच्छा ही हो रहा होगा गांव पर। चाचा जी वगैरह तो हैं ही वहां पर।
अगले हफ्ते रमेश अपनी मैडम को उनके मायके छोड़ता हुआ, अपने घर जी हां अपने पिता की छांव लेने 3 साल बाद रामपुर निकलता है। इस बीच दो दिन पहले ही उसके पिताजी का कॉल आया तो उसने सोचा कि पिताजी घर बुलाने के लिए कॉल कर रहे होंगे, और कॉल नहीं पिक किया कि अब तो जा ही रहा हूं ।
रामपुर की सीमा में प्रवेश करते हुए अपनी सफेद होंडा सिटी कार के शीशे को नीचे करते हुए एक सकून व स्नेह समेटे हवा का झोंके को महसूस किया। बड़े शहर की चकाचौंध में 3 सालों से उसने क्या क्या मिस किया ,उसे समझ आने लगा। थोड़ा और ड्राइव करते समय वह अपना बचपन व पिता के संघर्ष को याद करने लगा। आंखे भर आई, एक्सलेटर पर पैर तेजी से बढ़ रहे थे मानो प्रकाश की गति से जाकर अपने पिता के सीने से लिपट उन्हें थैंक्यू बोलूँगा, साथ ही इतने दिन उनसे ना मिलने के लिए सॉरी भी बोलूँगा। शायद मैं खुद भी उनकी जगह रहता तो अपने को माफ नही कर पाता पर मेरे पिताजी तो नो डिमांड नो एक्सपेक्टेशन और स्नेहिल ह्रदय वाले हैं, मेरे लिए उनके पास केवल स्नेहाभाव व शुभाशीष के अलावा कुछ नहीं था। यही सोचते सोचते कब हरिनाथ काका का घर आ गया पता नहीं चला। रमेश ने गाड़ी पार्क करते हुए उनका हाल पूछा, उन्होंने आश्चर्य से पूछा रमेश बेटा तुम यहाँ! तुम्हे तो हॉस्पिटल जाना चाहिए था। क्या! हॉस्पिटल! क्यों काका!
हाय राम! तुम्हें नहीं पता, धरम पाल बीते 2 दिनों से हस्पताल में भर्ती है, महिंदर बता रहा था आज तबीयत ज्यादा खराब है, हालत सीरियस है। परसो रोज तुम्हें कॉल किए थे, शायद बात नहीं हो पाई हो!
ओह नो! सर पर हाथ रखकर अवाक सा होते हुए रमेश, हड़बड़ी में कार को स्टार्ट कर के चंद मिनटों में हॉस्पिटल में पहुंच जाता है। महिंदर चाचा को एक गली में जाते हुए देखकर पीछे से दौड़ते हुए उनके पास पहुंचा। चाचा पिताजी कैसे हैं! कहां है! मुझे उनके पास ले चलो! नम आंखो से महिंदर उसके साथ कमरे के अंदर प्रवेश किया जहाँ उसने सफेद चादर से ढका एक मृत शरीर पाया, जो कि धरम पाल का था। पिताजी आप ऐसे निर्दयी कैसे हो सकते हैं? आप मुझे छोड़ कर यूं कैसे जा सकते हैं! एक बार बताया तो होता! मैं आपको नोएडा ले जाकर इलाज कराता!
ऐसी बातें सुन कर पहले तो महिंदर चाचा ने ढांढस बंधाया फिर रमेश से पूछा सच बताना- निर्दयी कौन?
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हैप्पी फादर्स डे
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रजनीकांत चौबे
बलिया/भोपाल
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